Home Politics केशवानंद भारती केस को 50 साल पूरे, इतिहास में पहली बार और आखिर बार बैठी थी 13 सदस्यीय बेंच

केशवानंद भारती केस को 50 साल पूरे, इतिहास में पहली बार और आखिर बार बैठी थी 13 सदस्यीय बेंच

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केशवानंद भारती केस को 50 साल पूरे, इतिहास में पहली बार और आखिर बार बैठी थी 13 सदस्यीय बेंच

ई दिल्ली । भारतीय लोकतंत्र के लिए 24 अप्रैल का दिन बेहद खास है। 50 साल पहले इसी दिन सुप्रीम कोर्ट की 13 सदस्यीय बेंच ने केशवानंद भारती केस की सुनवाई करते हुए संसद के मौलिक अधिकारों सहित संविधान के मूल ढांचे में संशोधन रोकने वाला ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार और आखिर बार इतने ज्यादा सदस्यों की बेंच बैठी थी। फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकारें संविधान से ऊपर नहीं हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती केस के 50 साल पूरा होने के उपलक्ष्य पर फैसले के रिकॉर्ड को अपलोड किया। सुप्रीम कोर्ट चाहती है कि यह फैसला न सिर्फ कानूनी पढ़ाई करने वाले पढ़ें, बल्कि देश-विदेश के बाकी लोग भी जान सके।
इस ऐतिहासिक केशवानंद भारती केस पर सुप्रीम कोर्ट ने 703 पन्नों में विस्तृत फैसला सुनाया था। इस केस के पीछे की कहानी बड़ी रोचक है। 13 सदस्यीय बेंच ने फैसले को सर्वसम्मति नहीं 7-6 के मार्जिन से सुनाया। इस फैसले को सुनाने वालों में उस वक्त तत्कालीन सीजेआई एसएम सीकरी, जस्टिस जेएम शेलत, केएस हेगड़े, एएन ग्रोवर, एएन रे, पीजे रेड्डी, डीजी पालेकर, एचआर खन्ना, केके मैथ्यू, एमएच बेग, एसएन द्विवेदी, बीके मुखर्जी और वाईवी चंद्रचूड़ शामिल थे। हालांकि केस केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य था लेकिन केस में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की काफी दिलचस्पी थी। वहां चाहती थीं कि फैसला भारती के खिलाफ आए, ताकि सरकार संविधान में मनमुताबिक बदलाव कर सके।
साल 1973 की बात है, जब केरल की तत्कालीन सरकार ने भूमि सुधार के लिए दो कानून लागू किए। इस कानून के मुताबिक, सरकार मठों की संपत्ति को जब्त कर देती। केरल सरकार के फैसले के खिलाफ इडनीर मठ के सर्वेसर्वा केशवानंद भारती ने खिलाफत की। वहां सरकार के खिलाफ चले गए। केशवानंद भारती ने अदालत में संविधान के अनुच्छेद 26 का जिक्र कर दलील दी कि हमें धर्म के प्रचार के लिए संस्था बनाने का अधिकार है। इसलिए सरकार ऐसी संस्थाओं की संपत्ति जब्त करके संविधान में मौजूद अधिकारों का हनन कर रही है। इस केस के द्वारा केशवानंद भारती ने न सिर्फ केरल सरकार बल्कि केंद्र में बैठी इंदिरा सरकार को भी सीधी चुनौती दे डाली थी।
दरअसल, उस वक्त सरकार चला रहीं इंदिरा गांधी अपने फैसलों को मनवाने के लिए एक के बाद एक कानूनों में बदलाव कर रहीं थी। हर बार इंदिरा को अपने फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से भी चुनौती मिल रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने लगातार इंदिरा के तीन बड़े फैसलों को ही पलट दिया था। इसमें बैंकों का राष्ट्रीयकरण करना, देसी रियासतों को दिए जाने वाले पैसे यानी प्रिवी पर्स को खत्म करना और कानून के मूल अधिकारों में बदलाव वाले फैसलों को पलट दिया था। अब इंदिरा सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से खींझ चुकीं थी। उन्होंने अब सुप्रीम कोर्ट को ही काबू में करने का मन बनाया। 5 नवंबर 1971 को सरकार ने संविधान में 24वां संशोधन करके सुप्रीम कोर्ट को सीधी चुनौती दे डाली। इंदिरा 1967 में सुनाए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बेअसर करना चाहती थी। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने गोलकनाथ केस में फैसला सुनाकर कहा था कि सरकार लोगों के मूल अधिकारों में कोई बदलाव नहीं कर सकती है।
अब केशवानंद भारती केस में सुप्रीम कोर्ट के सामने एक बार फिर ये सवाल उठा कि क्या सरकारें संविधान की मूल भावना को बदल सकती है? मामले की गंभीरता को देखकर सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली और आखिरी बार 13 जजों की बेंच बैठी। इस बेंच का नेतृत्व तत्कालीन सीजेआई सीकरी ने किया। 70 दिनों तक चली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने केशवानंद भारती केस पर 7-6 मार्जिन के साथ फैसला सुनाया। इस तरह फैसला केशवानंद भारती के पक्ष में आया। यह इंदिरा गांधी सरकार के लिए बड़ा झटका था। केशवानंद भारती केस पर फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने तीन प्रमुख टिप्पणियां की। इसमें पहली टिप्पणी थी सरकारें संविधान से ऊपर नहीं हैं। दूसरी, सरकार संविधान की मूल भावना के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती और तीसरी कि यदि सरकार अगर किसी भी कानून में बदलाव करती है, तब अदालत को सरकार के उस फैसले की न्यायिक समीक्षा करने का अधिकार है।

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